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बच्चों को शारीरिक दंड देना दंडनीय अपराध है

आजकल कुछ टीचर बच्चों को छोटी-छोटी बातों पर बेहद वहशीपन से भरी शारीरिक दंड की सजा देकर मानसिक दिवालियापन का परिचय दे रहे हैं। आप जानते हैं कि जीवन में माता-पिता के बाद अध्यापक का ही सर्वाेच्च स्थान माना गया है। अध्यापक ही बच्चों को सही शिक्षा देकर ज्ञानवान बनाते हैं, परंतु आज चंद अध्यापक-अध्यापिकाएं अपनी मर्यादा को भूल कर बच्चों पर अमानवीय अत्याचार कर रहे हैं जो पिछले कुछ दिनों से घटनाओं की झड़ी लगी है वह काफी पीड़ादायक है और सोचने को मजबूर कर देती है। ऐसे टीचर सच मे टीचर नहीं हो कर टीजर बन जाते हैं जो बच्चों के बालमन पर हमेशा के लिए बेहद बुरे अनुभव से भरी छाप छोड़ देते हैं ऐसे टीचर्स के जुल्म का शिकार बन ने वाले बच्चे कभी भी ऐसा करने वाले टीचर को सम्मान की नजर से नही देख पाते हैं उल्टा उनकी नजरों से तमाम टीचर्स का सम्मान कम हो जाता है। कुछ ताजा वारदातों का हवाला देते हुए आपको बता दें कि बीती 14 मार्च को शेडटीकेरे (कर्नाटक) स्थित सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक प्रमोद सोनक्की ने 13 वर्षीय छात्र को बैंत से बुरी तरह पीटा जिससे उसके शरीर पर नीले निशान पड़ गए और उसे तेज बुखार आ गया।15 मार्च को नागपुर (महाराष्ट्र) के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल की पांचवीं कक्षा की एक छात्रा को गणित का सवाल गलत हल करने पर उसकी शिक्षिका ने बेरहमी से पीट दिया जिससे उसके हाथ पर गहरी चोट लग गई।30 जून को मट्टानूर (केरल) स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल में दूसरी कक्षा का एक छात्र अपनी कापी पर अध्यापक विपिन द्वारा ब्लैकबोर्ड पर लिखे नोट्स धीरे-धीरे उतार रहा था जिससे नाराज होकर शिक्षक ने उस पर छड़ी से कई वार कर दिए जिससे उसकी पीठ से खून बहने लगा।

10 जुलाई को वाल्मीकि नगर (पश्चिम चम्पारण, बिहार) स्थित एक रैजीडैंशियल स्कूल के 10 वर्षीय छात्र कृष की किसी गलती की वजह से अध्यापक द्वारा पिटाई के परिणामस्वरूप मौत हो गई। 14 जुलाई को पटना (बिहार) के एक सरकारी स्कूल की छात्रा अध्यापक के पूछने पर अपना रोल नम्बर गलत बता बैठी, जिस पर गुस्से में आकर शिक्षक अमित कुमार ने उसे छड़ी से इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी पीठ लहू-लुहान हो गई और उस पर गहरे निशान पड़ गए।

15 जुलाई को मलीहाबाद (उत्तर प्रदेश) स्थित सीनियर सैकेंडरी स्कूल में होमवर्क पूरा न होने पर शिक्षक हसीब ने चौथी कक्षा के एक छात्र को डंडे से बुरी तरह पीट डाला जिससे उसे गंभीर चोटें आईं।

17 जुलाई को मयूरभंज (ओडिशा) में उदल स्थित एक सरकारी रैजीडेंशियल स्कूल के 4 छात्रों के बिना बताए रथ यात्रा देखने चले जाने पर गुस्से में आए अध्यापक ने लोहे के पाइप से उनकी बेरहमी से पिटाई कर डाली। इससे एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया।

18 जुलाई को बेतिया (बिहार) के सिरसिया मठिया स्थित  सरकारी सीनियर सैकेंडरी सकूल में एक शिक्षक ने छठी कक्षा के एक छात्र की इतनी बेरहमी से पिटाई की कि उसके शरीर पर गहरे घाव हो गए।

18 जुलाई को ही जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के बरसठी थाना क्षेत्र के चमरहा स्थित सरकारी प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील के वितरण के समय 2 बच्चों में विवाद की शिकायत मिलने पर शिक्षक मोहम्मद आरिफ नामक अध्यापक ने चौथी कक्षा में पढ़ने वाले प्रतीक यादव नामक 8 वर्षीय छात्र को इतनी बेरहमी से पीटा कि वह बेहोश हो गया। परिजनों ने पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई है।और अब 18 जुलाई को ही लुधियाना (पंजाब) में ब्रह्मपुरी स्थित सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र के माता-पिता ने अपने बच्चे के साथ मारपीट करने के आरोप में अध्यापिका रिंकू रानी के विरुद्ध पुलिस में दर्ज शिकायत में कहा है कि अध्यापिका ने बच्चे को इतनी बेरहमी से पीटा कि वह सदमे में चला गया और उसकी तबीयत बिगड़ गई।

भारत में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिनियम, 2009 की धारा 17 के तहत स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड देना या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है।

इसके अलावा, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अंतर्गत भी बच्चों के साथ क्रूरता करने वाले शिक्षकों के लिए सीधे जेल और जुर्माने की सजा का प्रावधान है, अतः इस प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए।

यही नहीं, अध्यापकों को नौकरी देते समय उनका इंटरव्यू लेने के साथ-साथ उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण करने के अलावा नौकरी देने के बाद भी नियमित रूप से उनकी काऊंसलिंग की जानी चाहिए तथा छात्रों से दुर्व्यवहार करने वाले अध्यापकों को शिक्षाप्रद सजा दी जाए ताकि उनके द्वारा छात्र-छात्राओं के उत्पीड़न का यह दुष्चक्र बंद हो। आप को बता देते हैं कि भारतीय न्याय संहिता के तहत  भारत में बच्चों को शारीरिक दंड  देना पूरी तरह से वर्जित और कानूनन दंडनीय अपराध है। नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता  और अन्य विशेष कानूनों के तहत बच्चों के खिलाफ होने वाली किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना को कड़ा अपराध माना गया है।बच्चों को सुरक्षा देने वाले प्रमुख कानूनी प्रावधान इस प्रकार हैं।

 भारतीय न्याय संहिता  के तहत प्रावधान में बच्चों को चोट पहुँचाने या उन पर बल प्रयोग करने के खिलाफ सीधी धाराएं हैं-स्वैच्छिक रूप से चोट पहुँचानारू यदि कोई शिक्षक या वयस्क किसी बच्चे को मारता है या चोट पहुँचाता है, तो उस पर भारतीय न्याय संहिता के तहत कड़ी कार्रवाई होती है (यह पूर्व में इंडियन पेनल कोड की धारा 323 और 352 के अंतर्गत आता था)। क्रूरता और हमलारू बच्चों के खिलाफ किए गए किसी भी तरह के शारीरिक हमले या गंभीर चोट पहुँचाने के कृत्य पर कारावास और भारी जुर्माने दोनों का प्रावधान है।शिक्षा का अधिकार  अधिनियम, 2009धारा 17(1)रू यह धारा स्कूलों में बच्चों को किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड देने और मानसिक उत्पीड़न करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है।धारा 17(2)- यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उसके सेवा नियमों  के तहत उसके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक और विभागीय कार्रवाई की जाती है। किशोर न्याय अधिनियम, 2015धारा 75 (क्रूरता के लिए दंड)- यदि बच्चों की देखरेख करने वाला कोई भी व्यक्ति (जैसे शिक्षक, अभिभावक या संस्थान के कर्मचारी) बच्चे पर हमला करता है, उसे छोड़ देता है या मानसिक/शारीरिक पीड़ा देता है, तो उसे 3 वर्ष तक की जेल और जुर्माना हो सकता है।

धारा 82- यह धारा विशेष रूप से बाल देखभाल संस्थानों के कर्मचारियों द्वारा बच्चों को शारीरिक दंड देने पर सख्त रोक लगाती है और इसे दंडनीय बनाती है।राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग  की गाइडलाइंस के अनुसार शारीरिक दंड में निम्नलिखित को शामिल किया गया है-बच्चों को मारना, थप्पड़ मारना, कान खींचना या बेंत/डंडे से पीटना।बच्चों को असहज स्थिति में खड़ा करना (जैसे बेंच पर खड़ा करना, मुर्गा बनाना या भारी बैग सिर पर रखवाना)।कक्षा या शौचालय जैसी बंद जगहों में बंद करना। आप किसी स्कूल या संस्थान में बच्चों के साथ हो रहे शारीरिक दंड के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। 

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