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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

भारतीय लोकतंत्र ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जनता की आवाज यदि संगठित, शांतिपूर्ण और निरंतर हो तो वह सबसे शक्तिशाली सत्ता को भी आत्ममंथन के लिए विवश कर सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है बल्कि यह उस लोकतांत्रिक दबाव की स्वीकारोक्ति भी है, जो पिछले कई सप्ताह से देशभर के लाखों युवाओं ने अपने धैर्य, अनुशासन और दृढ़ता से निर्मित किया। हाल के घटनाक्रमों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत के बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा हुई और आंदोलन के नेतृत्व ने दावा किया कि उनकी प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली गई। यह घटना केवल शिक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले वर्षों में इसे उस मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत की जेन-जी ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी से भी संचालित होता है।

इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसकी शुरुआत किसी स्थापित राजनीतिक दल ने नहीं की। यह आंदोलन सोशल मीडिया की दुनिया से निकला, व्यंग्य से शुरू हुआ और देखते ही देखते करोड़ों युवाओं की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन गया। जिस ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग कथित रूप से अपमान के लिए किया गया था, उसी शब्द को युवाओं ने अपने आत्मसम्मान और प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि वह अपमान को भी प्रतिरोध की शक्ति में बदल देता है। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को एक नया पाठ पढ़ाया है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सोशल मीडिया पर चलने वाले अभियान केवल कुछ दिनों की सनसनी होते हैं लेकिन इस बार ‘डिजिटल अभियान’ सड़क पर उतरा, शांतिपूर्ण जनआंदोलन में बदला और अंततः सत्ता को निर्णय लेने के लिए बाध्य कर गया। इससे स्पष्ट है कि भारत की नई पीढ़ी केवल ‘लाइक’ और ‘शेयर’ तक सीमित नहीं है; वह लोकतांत्रिक भागीदारी की नई भाषा लिख रही है।

हालांकि इस जीत का सबसे बड़ा श्रेय केवल आंदोलन की सफलता को नहीं बल्कि उसके संयम को भी जाता है। अनेक स्थानों पर तनाव और पुलिस कार्रवाई के बावजूद आंदोलन के नेतृत्व ने लगातार संवैधानिक और शांतिपूर्ण विरोध की अपील की। यही कारण है कि इस आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन मिला। लोकतंत्र में किसी भी जनआंदोलन की नैतिक शक्ति उसकी अहिंसा और अनुशासन से ही आती है। हालांकि इस जीत के साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं। क्या केवल एक मंत्री का इस्तीफा शिक्षा व्यवस्था की उन गहरी समस्याओं का समाधान कर देगा, जिनके कारण यह आंदोलन जन्मा? क्या प्रश्नपत्र लीक की घटनाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी? क्या भर्ती परीक्षाओं में वर्षों से चली आ रही देरी खत्म हो जाएगी? क्या करोड़ों युवाओं को रोजगार की नई संभावनाएं मिल जाएंगी? इन प्रश्नों का उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राजनीतिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण अवश्य है किंतु इसे अंतिम समाधान मान लेना भूल होगी। यदि परीक्षा प्रणाली की संरचनात्मक कमियां जस की तस रही, यदि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों में पारदर्शिता और तकनीकी सुरक्षा नहीं बढ़ी, यदि दोषियों को समयबद्ध दंड नहीं मिला और यदि भर्ती प्रक्रियाएं पहले की तरह वर्षों तक अटकी रही तो आज का यह जनसंतोष भविष्य में फिर नए रूप में सामने आ सकता है। सरकार के लिए भी यह आत्मचिंतन का अवसर है। लोकतंत्र में किसी आंदोलन को केवल राजनीतिक षड्यंत्र मानकर खारिज कर देना कभी भी दूरदर्शी नीति नहीं हो सकती। शुरुआत में यदि युवाओं की शिकायतों को अधिक गंभीरता से सुना जाता, संवाद स्थापित किया जाता और सुधारों की स्पष्ट समय सीमा घोषित की जाती तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। अंततः सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना और यही लोकतंत्र की सही दिशा भी है।

विपक्ष के लिए भी यह अवसर आत्ममंथन का है। इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इसकी ऊर्जा किसी पारंपरिक राजनीतिक दल से नहीं बल्कि युवाओं की स्वतःस्फूर्त भागीदारी से आई। इससे स्पष्ट संदेश मिलता है कि आज की पीढ़ी केवल राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि ठोस समाधान चाहती है। यदि विपक्ष भी केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित रहेगा और शिक्षा सुधार के ठोस एजेंडे पर गंभीरता नहीं दिखाएगा तो वह भी युवाओं की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाएगा। मीडिया और खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका पर भी प्रश्न उठते हैं। प्रारंभिक दिनों में आंदोलन को सोशल मीडिया की सनसनी समझने वाले अनेक मंच बाद में उसकी गंभीरता को स्वीकार करने के लिए विवश हुए। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व केवल टकराव के दृश्य दिखाना नहीं बल्कि उन कारणों की पड़ताल करना भी है, जिनके कारण लाखों युवा सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय लोकतंत्र में एक नई राजनीतिक संस्कृति की भी शुरुआत की है। यह संस्कृति व्यक्ति-पूजा से अधिक मुद्दों पर आधारित है। यह आंदोलन किसी जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म के आधार पर नहीं बल्कि समान अवसर, निष्पक्ष परीक्षा और जवाबदेह शासन जैसी सार्वभौमिक लोकतांत्रिक मांगों पर आधारित था। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति रही। आज आवश्यकता इस विजय का उत्सव मनाने से अधिक उसके संदेश को समझने की है। सरकार को परीक्षा प्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, डिजिटल सुरक्षा, समयबद्ध भर्ती, स्वतंत्र परीक्षा नियामक और दोषियों के लिए त्वरित दंड जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देनी होगी। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास तभी लौटेगा, जब छात्र यह महसूस करेगा कि उसकी मेहनत किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी। भारत विश्व का सबसे युवा देश है। यही युवा आने वाले विकसित भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि यही पीढ़ी व्यवस्था पर विश्वास खो दे तो किसी भी आर्थिक उपलब्धि का महत्व कम हो जाएगा लेकिन यदि यही पीढ़ी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाए, सरकार उसे सुने, विपक्ष जिम्मेदारी निभाए और संस्थाएं स्वयं को सुधारें तो यही ऊर्जा भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।

बहरहाल, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है, यह लोकतंत्र की उस जीवंतता का प्रमाण है, जिसमें सत्ता से अधिक शक्तिशाली जनता का विश्वास होता है। जेन-जी ने यह सिद्ध कर दिया है कि शांतिपूर्ण जनशक्ति आज भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। अब अगली परीक्षा सरकार की है कि क्या वह इस जनादेश को केवल एक राजनीतिक संकट मानकर भूल जाएगी या इसे शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधारों का अवसर बनाएगी? यदि इस आंदोलन से केवल चेहरा बदला और व्यवस्था नहीं बदली तो इतिहास इसे अधूरी जीत कहेगा लेकिन यदि इससे परीक्षा प्रणाली पारदर्शी बनी, युवाओं का भरोसा लौटा और जवाबदेही संस्थागत रूप ले सकी, तब यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उस क्षण के रूप में दर्ज होगा, जब देश की नई पीढ़ी ने सत्ता को हराया नहीं बल्कि लोकतंत्र को मजबूत किया।

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