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मंत्र और प्राणायाम

आधुनिक युग में बच्चों का जीवन अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और मानसिक रूप से तनावपूर्ण हो गया है। आज की इस भागदौड़ भरी दुनिया में बच्चों पर परीक्षाओं में अव्वल आने और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने का भारी मानसिक दबाव लगातार बना रहता है। इस अकादमिक और सामाजिक दबाव के कारण आज के बच्चों में एकाग्रता की कमी, ध्यान का बार-बार भटकना, मानसिक तनाव और शारीरिक शिथिलता जैसी गंभीर समस्याएं बेहद आम होती जा रही हैं। ऐसी स्थिति में सनातन भारतीय संस्कृति का अनुपम उपहार योग बच्चों के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए एक अचूक और गहरा सकारात्मक प्रभाव डालने वाला सर्वाेत्तम माध्यम सिद्ध हो रहा है। योग न केवल बच्चों के शारीरिक विकास को प्राकृतिक रूप से बढ़ावा देता है, बल्कि उनके ध्यान और एकाग्रता में अभूतपूर्व सुधार करते हुए शैक्षणिक तनाव व चिंता को समूल नष्ट करने में पूरी तरह सहायक है।

बच्चों के अभ्यास में सूर्य नमस्कार को सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय स्थान प्राप्त है। सूर्य नमस्कार, यानी सूर्य को प्रणाम करना, एक महत्वपूर्ण योगिक अभ्यास है जिसकी उत्पत्ति प्राचीन वैदिक काल में हुई थी, जब सूर्य को आध्यात्मिक चेतना के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में पूजा जाता था। अपने इसी गूढ़ उद्गम से विकसित होकर सूर्य नमस्कार बारह आसनों का एक अभ्यास बन गया है जो प्राण यानी सूक्ष्म ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए एक साथ बुने जाते हैं, जिसका उद्देश्य अभ्यासकर्ता का शुद्धिकरण और कायाकल्प करना है।

बच्चों पर सूर्य नमस्कार का वैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत सकारात्मक है। यह शारीरिक अंगों, श्वसन तंत्र और मस्तिष्क के विकास को संतुलित करता है, जिससे बच्चों की एकाग्रता और ऊर्जा स्तर में वृद्धि होती है। यह मानसिक विकास और एकाग्रता में सहायक होता है। सूर्य नमस्कार में आगे और पीछे झुकने वाले आसनों से सिर तक रक्त संचार बढ़ता है, जो सोचने की क्षमता और याददाश्त को मजबूत करता है। वहीं यह तनाव कम कर बच्चों के नर्वस सिस्टम को शांत करता है, जिससे आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में उन्हें चिंता और ध्यान भटकने जैसी समस्याओं से राहत मिलती है।

यह शारीरिक स्तर पर बच्चों के पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। पेट के अंगों पर दबाव पड़ने से पाचन क्रिया बेहतर होती है, जिससे बच्चों में भूख न लगने और पेट दर्द जैसी समस्याएं दूर होती हैं। साथ ही यह शरीर को अंदर से डिटॉक्स करता है और हार्माेनल संतुलन बनाए रखता है, जिससे बच्चों की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। यह बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और यौवनारंभ को संतुलित करने में अत्यंत लाभकारी है। इसके अभ्यास के दौरान गहरी सांस लेने से फेफड़ों की कार्यक्षमता में बड़ा सुधार होता है। यह पूरी तरह से सांस लेने की क्षमता बढ़ाता है, जो तंत्रिका तंत्र को शांत करता है। विभिन्न आसनों का निरंतर प्रवाह हृदय गति को बढ़ाता है, जिससे यह एक हल्का कार्डियो व्यायाम बन जाता है, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए उत्कृष्ट है। यह शरीर की मुख्य ग्रंथियों जैसे थायराइड, अग्न्याशय, अधिवृक्क और पिट्यूटरी ग्रंथियों को उत्तेजित करता है, जिससे चयापचय, रक्त शर्करा नियंत्रण और हार्माेनल संतुलन में मदद मिलती है। नियमित अभ्यास से कोर्टिसोल यानी तनाव हार्माेन कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है और पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र को सक्रिय करके याददाश्त तेज होती है।

योग के क्षेत्र में सूर्य नमस्कार का एक जीवनशक्ति प्रदायक अभ्यास के रूप में विख्यात है। इसके अभ्यास के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य, शक्ति तथा क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। साथ ही साथ आध्यात्मिक प्रगति भी होती है। इसका मिला-जुला परिणाम चेतना के विकास के रूप में परिलक्षित होता है। योगमय जीवन प्रारम्भ करने के उद्देश्य से सूर्य नमस्कार एक सम्पूर्ण अभ्यास है और इसके लिए मात्र 5 से 15 मिनट तक का नियमित समय देकर इससे प्राप्त होने वाले आश्चर्यजनक लाभों का अनुभव किया जा सकता है। अत्यंत व्यस्त व्यक्तियों जैसे व्यवसायियों, गृहणियों, परीक्षा में व्यस्त विद्यार्थियों अथवा मरीजों में व्यस्त डॉक्टरों आदि के लिए भी यह एक आदर्श एवं उपयुक्त अभ्यास है।

सूर्य नमस्कार एक ऐसा अभ्यास है, जिसका प्रारंभ अति प्राचीन काल से उस समय हुआ जब मनुष्य सबसे पहले अपने अंदर स्थित आध्यात्मिक शक्ति के प्रति सजग हुआ था। सूर्य नमस्कार के अभ्यास से मानव प्रकृति का सौर पक्ष जाग्रत होता है तथा सर्वाेच्च चेतना का विकास करने हेतु जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होती है।  

बीसवीं सदी के भारत के प्रख्यात योगी, चिकित्सक, आध्यात्मिक गुरु और वेदांत के महान आचार्य स्वामी शिवानंद के शिष्य और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बिहार योग विद्यालय के संस्थापक स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक योग प्नदीप भाग-2 में बच्चों के लिए योग पर लिखा है कि  8 वर्ष की उम्र से सूर्य नमस्कार, नाड़ी शोधन प्राणायाम और गायत्री मंत्र का अभ्यास शुरू कराना चाहिए। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि  सात से बारह वर्ष की उम्र में बच्चों में कतिपय प्रवृतियों में असंतुलन रहता है। शारीरिक विकास और मनोवैज्ञानिक विकास एक साथ पूरे नहीं होते।ये असंतुलन बच्चों की समस्केया का मूल कारण होता है।ये अभ्यास पीनियल ग्रंथी को स्वस्थ बनाए रखने के साथ साथ जीवन को अतिरिक्त आयु भी प्रदान करता है। मंत्र विचलित मन को संतुलित रखता है। सात आठ वर्ष की आयु में पीनियल ग्रंथी का ह्रास होने लगता है और जब यह प्रक्रिया एक निश्चित सीमा तक बढ़ जाती है तब यौन हार्माेन सक्रिय हो जाता है भावनात्मक विकास अत्यंत तीव्र हो जाता है और बच्चे में समंजन करना कठिन हो जाता है।पीनियल ग्रंथी मस्तिष्क में में बुला आंबलांन्गाटा के शीर्ष पर रहता है। जब तक पीनियल ग्रंथी स्वस्थ रहता है, बच्चे अराजक व्यवहार नहीं करते हैं। स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पुस्तक सूर्य नमस्कार  में सूर्य-नमस्कार के विस्तार से बताया गया है। परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार बच्चों के लिए योग एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। जिस प्रकार हम शिक्षा प्राप्त करने और अपनी बुद्धि क्षमता बढ़ाने के लिए स्कूल जाते हैं, उसी प्रकार योग का अभ्यास करने से हमारी सीखने की क्षमता में काफी वृद्धि होती है। परमहंस निरंजनानंद के अनुसार सूर्य नमस्कार में पाँच अलग-अलग आसन शामिल हैं जो शरीर के विभिन्न अंगों और ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं, जिससे वे सर्वाेत्तम रूप से कार्य करते हैं। इसका अभ्यास सुबह के समय करना चाहिए, जब वातावरण शांत और स्थिर हो, आप तरोताजा हों और पढ़ाई के तनाव से मुक्त हों। यह रक्त संचार को बेहतर बनाने, शरीर के विभिन्न अंगों को ऊर्जा प्रदान करने और श्वास को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

मानव जीवन में सांस का बहुत महत्व है। जब आप क्रोधित, तनावग्रस्त या निराश होते हैं, तो आपकी सांसें बहुत उथली और तेज हो जाती हैं। वहीं, जब आप शांत और तनावमुक्त होते हैं, तो सांसें गहरी और लंबी होती हैं। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि सांस मस्तिष्क की कई गतिविधियों को नियंत्रित करती है और सांस पर नियंत्रण से हम मन की स्थिति को बदल सकते हैं, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र में तनाव के स्तर को कम कर सकते हैं और सामंजस्य एवं शांति का अनुभव कर सकते हैं।

बच्चों के लिए गायत्री मंत्र का जाप अत्यंत लाभकारी है। वैज्ञानिक अध्ययनों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, नियमित जाप से बच्चों की एकाग्रता, याददाश्त और सीखने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होता है। इसके अलावा, यह मानसिक शांति प्रदान करता है और नकारात्मक विचारों को दूर रखने में मदद करता है। गायत्री मंत्र का लयबद्ध उच्चारण मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करता है जो ध्यान और सीखने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई में रुचि बढ़ती है तथा बेहतर एकाग्रता और स्मरण शक्ति में सहायता मिलती है। इससे तनाव और चिंता में कमी होती है। मंत्र के कंपन से मन शांत होता है, जिससे बच्चों का अतिसक्रियता व्यवहार कम होता है और वे परीक्षा के तनाव को आसानी से झेल पाते हैं।

स्वामी निरंजनानंद सरस्वती बच्चों को सुबह दैनिक दिनचर्या आरंभ करने से पहले 11 बार महामृत्युंजय मंत्र, 11 बार गायत्री मंत्र और तीन बार देवी दुर्गा के बत्तीस नामों का पाठ प्रतिदिन करने के लिए बताते हैं। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार नाड़ी शोधन प्राणायाम, यानी एक के बाद एक नासिका से श्वास लेना, सबसे अधिक प्रचलित प्राणायाम है। यह एक महत्वपूर्ण शुद्धिकरण विधि है क्योंकि यह नाड़ियों में प्राण के प्रवाह में अवरोधों को दूर करती है। हठ योग प्रदीपिका और घेरंड संहिता के अनुसार, योगी कुंभक अर्थात श्वास धारण का अभ्यास करने के लिए तभी तैयार होता है जब नाड़ियाँ और चक्र शुद्ध हो जाएँ। राज योग और हठ योग में प्राणायाम का अभ्यास हमेशा ध्यान से पहले किया जाता है।

भ्रामरी प्राणायाम, जिसमें कान बंद करके मधुमक्खी की तरह गुनगुनाना शामिल है, मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को संतुलित करता है। मस्तिष्क के एक भाग को दायाँ मस्तिष्क और दूसरे भाग को बायाँ मस्तिष्क कहा जाता है। कई बार दाएँ मस्तिष्क में कुछ भी शेष नहीं होता और बाएँ मस्तिष्क में कुछ भी सही नहीं होता। इसलिए जब दाएँ मस्तिष्क में कुछ भी शेष नहीं होता और बाएँ मस्तिष्क में कुछ भी सही नहीं होता, तो आप ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते, पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो सकते और जीवन में सफल नहीं हो सकते। मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों की क्षमताओं को एकीकृत करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम नामक अभ्यास सबसे उत्तम है।

नाड़ी शोधन एक विशेष विधि से किया जाना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले एक सीढ़ी की कल्पना करें। यदि हम सीढ़ी को एक तरफ से देखें, तो हमें उसके पायदान दिखाई देंगे। हमें अपनी सांस को इस प्रकार नियंत्रित करना है जैसे हम पायदान चढ़ रहे हों। उदाहरण के लिए, यदि हमें एक सांस में सात पायदान चढ़ने हैं, तो हम कल्पना करते हैं, सांस लेते हैं और एक पायदान ऊपर चढ़ते हैं, सांस रोकते हैं, फिर सांस लेते हैं, एक पायदान ऊपर चढ़ते हैं, सांस रोकते हैं, फिर सांस लेते हैं, एक पायदान ऊपर चढ़ते हैं, इत्यादि। इस प्रकार एक सांस लेना सात चरणों में विभाजित हो जाता है। फिर हम इसी प्रकार सांस छोड़ते हैं, इसलिए सांस छोड़ना भी सात चरणों में विभाजित हो जाता है।

इसकी अभ्यास विधि इस प्रकार है कि सबसे पहले दाहिनी नाक बंद करें। बाईं नाक से सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, इस तरह एक सांस में सात कदम चलें। फिर बाईं नाक से ही सांस बाहर छोड़ें और इसी तरह सात सीढ़ियां उतरें। अब, बाईं नाक बंद करें, दाहिनी नाक खोलें, और फिर से दाहिनी नाक से सांस अंदर लें, रोकें, सांस अंदर लें, रोकें, ऐसे कुल सात कदम चलें। फिर दाहिनी नाक से ही सांस बाहर छोड़ें और सात सीढ़ियां उतरें। अगर आपको कोई थकान महसूस हो, तो कदमों की संख्या कम कर दें। नाड़ी शोधन प्राणायाम के अभ्यास को पूरा करने के लिए प्रत्येक नथुने से लगभग पाँच बार यही प्रक्रिया दोहराएँ। यदि आप इस अभ्यास को समझकर करते हैं, तो आप पाएंगे कि मस्तिष्क की याद रखने की क्षमता बढ़ जाएगी। आप कम प्रयास से ही चीजों को याद रख पाएंगे और एकाग्रता बढ़ा पाएंगे।

भ्रामरी प्राणायाम, जिसमें कान बंद करके मधुमक्खी की तरह गुनगुनाना शामिल है, मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को संतुलित करता है। जब दाएँ मस्तिष्क में कुछ भी शेष नहीं होता और बाएँ मस्तिष्क में कुछ भी सही नहीं होता, तो एकाग्र होना कठिन हो जाता है। अतः अपनी पढ़ाई में सफल होने और मन पर नियंत्रण विकसित करने के लिए, ये तीन अभ्यास यानी सूर्य नमस्कार, नाड़ी शोधन प्राणायाम और गायत्री मंत्र का जाप बच्चों के लिए पूरी तरह से अनिवार्य हैं।


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