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पंडित राजकुमार शुक्ल- किसान की जिद ने गांधी को चंपारण तक पहुंचाया

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी केवल बड़े नेताओं की कहानी नहीं है। उसके पीछे ऐसे अनगिनत लोग थे, जिन्होंने अपने छोटे-से इलाके में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और बड़े बदलाव की जमीन तैयार की। चंपारण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 1917 का चंपारण सत्याग्रह महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन का निर्णायक अध्याय बना, लेकिन गांधी को चंपारण तक पहुंचाने में जिस किसान की जिद ने इतिहास की दिशा बदल दी, उसका नाम थाकृपंडित राजकुमार शुक्ल।

23 अगस्त 1875 को पश्चिम चंपारण के सतबरिया गांव में जन्मे राजकुमार शुक्ल के पास न कोई बड़ा राजनीतिक संगठन था, न सत्ता और न आर्थिक ताकत। उनके पास था तो नील की खेती से परेशान किसानों का दर्द और उस दर्द को न्याय दिलाने का संकल्प। यही संकल्प उनके जीवन का सबसे बड़ा अभियान बन गया। चंपारण सत्याग्रह को केवल गांधी के आगमन से जोड़ना इतिहास को अधूरा देखना होगा। गांधी के आने से पहले ही चंपारण में नील की जबरन खेती और नीलहों के शोषण के खिलाफ किसानों का असंतोष बढ़ रहा था। शेख गुलाब, राजकुमार शुक्ल, हरबंश सहाय, पीर मोहम्मद मुनिश, संत राउत, लोमराज सिंह और राधुमल जैसे लोगों ने अलग-अलग स्तर पर किसानों की आवाज उठाई। नील की खेती किसानों के लिए महज कृषि की समस्या नहीं थी। पंचकठिया जैसी व्यवस्था के तहत उन्हें अपनी जमीन के एक हिस्से में नील उगाने के लिए बाध्य किया जाता था। इससे किसान आर्थिक रूप से कमजोर होते गए और अपनी ही जमीन पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता खोने लगे।

किसानों पर मुकदमे हुए, दमन हुआ और दबाव बढ़ाया गया। पत्रकार पीर मोहम्मद मुनिश ने कलम के जरिए चंपारण की स्थिति को सामने लाने का प्रयास किया। दूसरी ओर राजकुमार शुक्ल गांव-गांव घूमकर किसानों की पीड़ा समझ रहे थे। शुक्ल ने जल्दी समझ लिया कि स्थानीय स्तर का संघर्ष अकेले अंग्रेजी शासन को झुका नहीं सकता। किसान की आवाज को राष्ट्रीय मंच चाहिए। ऐसा नेतृत्व चाहिए, जिसकी बात सरकार नजरअंदाज न कर सके। इसी तलाश ने उन्हें गांधी तक पहुंचाया। राजकुमार शुक्ल ने गांधी के बारे में सुना था और उन्हें लगा कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने वाला यह नेता चंपारण के किसानों की आवाज को देश के सामने रख सकता है।

इसके बाद शुरू हुई उनकी गांधी को चंपारण लाने की मुहिम।

गांधी जहां जाते, शुक्ल वहां पहुंच जाते। कांग्रेस के अधिवेशनों में वे गांधी का इंतजार करते। उनसे बार-बार चंपारण चलने का आग्रह करते। पत्र लिखते और लिखवाते। उनकी जिद इतनी लगातार थी कि गांधी को अंततः उनके आग्रह के सामने झुकना पड़ा। यह किसी राजनीतिक पद की महत्वाकांक्षा नहीं थी। यह उस किसान की बेचौनी थी, जो अपने गांव और अपने लोगों की समस्या का समाधान चाहता था। आखिरकार 1917 में गांधी चंपारण पहुंचे। किसानों की शिकायतें सुनीं, गांवों में गए, वास्तविक स्थिति का अध्ययन किया और प्रशासन के सामने तथ्य रखे। चंपारण में पहली बार किसान की रोजमर्रा की पीड़ा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आई। गांधी के लिए भी यह अनुभव महत्वपूर्ण था। चंपारण ने उनकी राजनीति को भारतीय ग्रामीण जीवन से गहराई से जोड़ा। सत्याग्रह अब केवल राजनीतिक सिद्धांत नहीं रहा; वह गरीब और पीड़ित व्यक्ति के जीवन से जुड़ा संघर्ष बन गया।

लेकिन इस परिवर्तन की पहली दस्तक राजकुमार शुक्ल ने दी थी

राजकुमार शुक्ल की भूमिका गांधी को चंपारण लाने के साथ समाप्त नहीं हुई। वे किसानों के बीच सक्रिय रहे और ग्रामीण समाज में राजनीतिक चेतना फैलाते रहे। रौलट एक्ट के विरोध और असहयोग आंदोलन के दौर में भी उनकी सक्रियता बनी रही। किसान संगठनों के काम से भी वे जुड़े। इसलिए उन्हें केवल गांधी के आग्रहकर्ता के रूप में देखना उचित नहीं है। वे अपने समय के स्वतंत्र किसान नेता थे। गांधी ने उनके संघर्ष को राष्ट्रीय मंच दिया, लेकिन संघर्ष का बीज चंपारण की धरती पर पहले ही पड़ चुका था। उनके निजी जीवन में उनकी पत्नी केवला देवी का योगदान भी महत्वपूर्ण था। स्थानीय स्मृतियों में उन्हें शुक्ल के संघर्ष को संबल देने वाली महिला के रूप में याद किया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा की कहानियों में ऐसे पारिवारिक सहयोग का उल्लेख बहुत कम मिलता है। राजकुमार शुक्ल की जिद जीवन के अंतिम दौर तक बनी रही। गांधी के चंपारण से लौट जाने के बाद भी वे चाहते थे कि गांधी फिर वहां आएं। अखबारों से गांधी की गतिविधियों की जानकारी लेते और उन्हें पत्र लिखते रहे।

1929 की शुरुआत में वे साबरमती आश्रम पहुंच गए। तब उनकी हालत बहुत खराब थी। कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद गांधी से मुलाकात हुई। वर्षों के संघर्ष से थके शुक्ल की चिंता तब भी चंपारण ही था। साबरमती से लौटने के बाद वे अपने गांव नहीं गए। मोतिहारी की केडिया धर्मशाला में उन्होंने वही कमरा चुना, जहां कभी गांधी ठहरे थे। 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनका निधन हो गया। उनकी बेटी देवपति उनके पास थीं। उनकी मृत्यु से जुड़ा ऐमन का प्रसंग चंपारण की लोकस्मृति में मिलता है। कहा जाता है कि लंबे संघर्ष के बावजूद शुक्ल की मृत्यु पर उनके विरोधी पक्ष ने भी सम्मान व्यक्त किया। ऐसे प्रसंगों को ऐतिहासिक प्रमाण से अधिक लोकस्मृति के रूप में देखना चाहिए, लेकिन यह जरूर बताता है कि शुक्ल की निर्भीकता ने अपने विरोधियों पर भी प्रभाव छोड़ा था।

राजकुमार शुक्ल की कहानी केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। आज के भारत में भी इसकी प्रासंगिकता है।

आज किसान, मजदूर, छोटे उत्पादक और ग्रामीण समाज अपनी समस्याओं को लेकर सरकारों और संस्थाओं के सामने आवाज उठाते हैं। ऐसे समय में शुक्ल का जीवन बताता है कि लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है। अपनी समस्या को सार्वजनिक प्रश्न बनाना, संगठित होकर आवाज उठाना और समाधान के लिए लगातार प्रयास करना भी लोकतांत्रिक नागरिकता का हिस्सा है।

शुक्ल ने अपनी समस्या को व्यक्तिगत शिकायत नहीं बनने दिया। उन्होंने किसानों के दर्द को सामूहिक सवाल बनाया। फिर उस सवाल को स्थानीय सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय नेतृत्व के दरवाजे तक पहुंचाया। आज संचार के साधन पहले से कहीं ज्यादा हैं। सोशल मीडिया, समाचार माध्यम, न्यायपालिका और जनप्रतिनिधियों के जरिए आवाज उठाने के अनेक रास्ते हैं। इसके बावजूद कई बार आम आदमी की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचने में संघर्ष करती है। ऐसे समय में शुक्ल का संघर्ष बताता है कि बदलाव के लिए केवल साधन नहीं, निरंतरता और संकल्प भी जरूरी है। उनकी कहानी स्थानीय नेतृत्व की ताकत भी बताती है। बड़े बदलाव हमेशा राजधानी से शुरू नहीं होते। कई बार परिवर्तन की पहली आवाज किसी छोटे गांव से उठती है। राष्ट्रीय नेतृत्व तभी प्रभावी बनता है, जब वह जमीन से उठी उस आवाज को सुनता है।

आज किसान अधिकार, सामाजिक न्याय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जनभागीदारी की चर्चा के बीच राजकुमार शुक्ल की स्मृति इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने समय के अन्याय को नियति मानने से इनकार कर दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल गांधी, नेहरू, पटेल या दूसरे बड़े नेताओं का इतिहास नहीं है। वह उन किसानों, मजदूरों, पत्रकारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का भी इतिहास है, जिन्होंने संघर्ष की जमीन तैयार की। गांधी चंपारण के महानायक हैं। इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन गांधी को चंपारण तक पहुंचाने वाली ऐतिहासिक प्रक्रिया में राजकुमार शुक्ल एक केंद्रीय कड़ी थे। 

गांधी को याद करते हुए शुक्ल को भूल जाना उस किसान की आवाज को फिर दबाना होगा, जिसने लगातार गांधी से कहा चंपारण चलिए।

गांधी गए। चंपारण बदला। भारतीय राजनीति बदली। गांधी का राजनीतिक व्यक्तित्व भी बदला।

लेकिन उस परिवर्तन की पहली दस्तक सतबरिया के एक किसान ने दी थी।

राजकुमार शुक्ल केवल गांधी को चंपारण लाने वाले किसान नहीं थे। वे उस भारत की आवाज थे, जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अपने अधिकार के लिए खड़ा होना सीख रहा था। उनकी कहानी आज भी यही कहती है | लोकतंत्र में आवाज छोटी-बड़ी नहीं होती, उसे लगातार उठाने का साहस बड़ा होता है।

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