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भारतीय सनातन परंपरा में यदि किसी देवता को आदि और अनादि, सरल और गूढ़, संहारक और सृजनकर्ता ,इन सभी विरोधाभासी प्रतीकों का अद्वितीय संगम माना गया है, तो वे भगवान शिव हैं। शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना का वह परम तत्व हैं जो समस्त सृष्टि के मूल में विद्यमान है। महाशिवरात्रि उसी शिवत्व के जागरण की पावन रात्रि है।वह रात्रि जब साधक अपने भीतर के तम, रज और सत्व के पार जाकर शिव के शुभ तत्व से जुड़ने का प्रयास करता है। यह केवल उपवास या पूजन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मजागरण, आत्मसंयम और आत्मोन्नति का दिव्य अवसर है। भगवान शिव का स्वरूप स्वयं में गहन दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र मन की शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। जटाओं में विराजमान गंगा शुद्धता और जीवनदायिनी ऊर्जा का संकेत देती है। तीसरा नेत्र ज्ञान की उस अग्नि का प्रतीक है जो अज्ञान और अहंकार को भस्म कर देती है। गले में सर्प यह दर्शाता है कि जिसने भय और मृत्यु पर विजय पा ली, वही शिव है। शरीर पर भस्म इस सत्य का उद्घोष करती है कि यह संसार नश्वर है और अंततः सब कुछ पंचतत्व में विलीन हो जाना है।
त्रिशूल शिव के हाथ में केवल एक आयुध नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक संदेश है। यह तीन गुणोंकृसत्व, रज और तमकृपर विजय का प्रतीक है। यह दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति का संकेत है। जो इन तीनों संतापों से ऊपर उठ जाए, वही शिवत्व को प्राप्त करता है। नंदी वृषभ धर्म का प्रतीक है, जिसके चार पांव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थों को दर्शाते हैं। शिव समाधिस्थ योगी हैं, किंतु आवश्यकता पड़ने पर रौद्र रूप धारण कर अधर्म का संहार भी करते हैं। इस प्रकार वे संतुलन और न्याय के अधिष्ठाता हैं।
शिव का नटराज स्वरूप सृष्टि चक्र की गहन व्याख्या करता है। उनका तांडव नृत्य सृजन, पालन और संहार तीनों का प्रतीक है। एक हाथ में डमरू, जिससे नाद उत्पन्न हुआ और सृष्टि का प्रारंभ हुआ; दूसरे हाथ में अग्नि, जो संहार और पुनर्निर्माण का संकेत देती है। उनके चरणों तले अपस्मार पुरुष अज्ञान और विस्मृति का प्रतीक है, जिसे शिव अपने ज्ञान से दबाए रखते हैं। यह संदेश है कि जब तक अज्ञान का दमन नहीं होगा, तब तक जीवन में प्रकाश नहीं आएगा।
शिव की आराधना का विशेष महत्व रात्रि में माना गया है। रात्रि तमोगुण का प्रतीक है, और शिव तम के भी अधिपति हैं। जब संसार निद्रा में लीन होता है, तब साधक जागकर शिव से जुड़ता है। शिवरात्रि का कृष्ण पक्ष में होना भी प्रतीकात्मक है। जैसे चंद्रमा क्षीण होकर अमावस्या की ओर बढ़ता है, वैसे ही साधक अपने अहंकार और वासनाओं को क्षीण करता हुआ शिव में विलीन होने का प्रयास करता है। यह आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का पर्व है। शिव की उपासना सरल है। वे भोलेनाथ हैं।अल्प से प्रसन्न हो जाने वाले। बेलपत्र, जल, भस्म और रुद्राक्ष से ही वे प्रसन्न हो जाते हैं। शिव की आराधना से मानसिक शांति, आत्मबल और भय से मुक्ति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति नियमित रूप से रुद्राभिषेक करता है, उसके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जप रोग, भय और अकाल मृत्यु के संकट को दूर करने वाला माना गया है। शिव भक्ति से व्यक्ति में वैराग्य, संयम और संतुलन का विकास होता है। यह भोग और मोक्षकृदोनों का मार्ग प्रशस्त करती है।
सृष्टि चक्र पर शिव का वर्चस्व सर्वविदित है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु उसका पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं। किंतु यह संहार विनाश नहीं, बल्कि नवसृजन की भूमिका है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर अंकुर बनता है, वैसे ही संहार के बाद ही नई सृष्टि का उदय होता है। प्रलयकाल में समस्त सृष्टि शिव में लीन हो जाती है। वे ही आदियोगी हैं, जिनसे योग का प्रारंभ हुआ। वे ही आदिनाथ हैं, जिनसे तंत्र और ध्यान की परंपरा चली।
द्वादश ज्योतिर्लिंग शिव की दिव्य ज्योति के बारह स्वरूप माने गए हैं। सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वरम और घृष्णेश्वर। ये सभी ज्योतिर्लिंग केवल तीर्थ नहीं, बल्कि ऊर्जा केंद्र हैं। इनका दर्शन और पूजन करने से व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक जागरण होता है। कहा जाता है कि इन ज्योतिर्लिंगों के स्मरण मात्र से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
सोमनाथ चंद्रमा के क्षय रोग से मुक्ति का प्रतीक है, महाकालेश्वर काल के भय से रक्षा करते हैं। केदारनाथ हिमालय की तपस्या और त्याग का संदेश देते हैं। काशी विश्वनाथ मोक्षदायिनी नगरी के स्वामी हैं, जहां मृत्यु भी मुक्ति का द्वार बन जाती है। रामेश्वरम में स्वयं श्रीराम ने शिव की पूजा कर विजय प्राप्त की थी। प्रत्येक ज्योतिर्लिंग जीवन के किसी न किसी संकट से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी ज्योतिर्लिंगों का महत्व रोचक है। सूर्य की एक ज्योति से बारह मास और बारह राशियां उत्पन्न होती हैं। उसी प्रकार शिव की ज्योति के बारह स्वरूप समस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक हैं। इन स्थलों पर प्राकृतिक ऊर्जा का विशेष संचार अनुभव किया जाता है, जिससे साधक की चेतना ऊर्ध्वगामी होती है। शिव का संदेश सरल है। अहंकार का त्याग, आत्मसंयम और समत्व की भावना। वे सिखाते हैं कि शक्ति के बिना शिव शव हैं, अर्थात् ऊर्जा और चेतना का संतुलन ही जीवन का आधार है। शिव और शक्ति का मिलन ही सृष्टि का आधार है। महाशिवरात्रि इसी दिव्य मिलन का प्रतीक है। अंततः शिव की महिमा शब्दों में सीमित नहीं की जा सकती। वे करुणावतार भी हैं और रुद्र भी। वे भस्मासुर के वरदाता भी हैं और अधर्म के संहारक भी। वे योगी भी हैं और गृहस्थ भी। उनका स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन, संयम और समर्पण ही वास्तविक साधना है। शिव की आराधना से मनुष्य अपने भीतर के पशुत्व पर विजय प्राप्त कर दिव्यता की ओर अग्रसर होता है। हर हर महादेव का उद्घोष केवल एक नारा नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरण का मंत्र है। शिव की कृपा से जीवन में शांति, समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। महादेव सृष्टि के आदि हैं, अंत हैं और अनंत भी। वही सत्य हैं, वही ब्रह्म हैं, वही परम चेतना हैं।जिनमें समस्त जगत समाहित है।
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