Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
सर्दियों ने अभी पूरी तरह दस्तक भी नहीं दी है कि देश के अनेक शहरों की हवा में प्रदूषण का जहर घुलने लगा है। दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता का तेजी से बिगड़ना इस बात का संकेत है कि प्रदूषण का संकट अब केवल सर्दियों की मौसमी समस्या नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरणीय प्रबंधन, शहरी विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुका है। हर साल अक्टूबर-नवंबर में दमघोंटू धुंध, आंखों में जलन, सांस लेने में कठिनाई और अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की संख्या के साथ यह संकट सामने आता है।
विडंबना यह है कि समस्या के कारणों की पहचान होने और उपायों की जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद हम हर वर्ष उसी त्रासदी को दोहराने के लिए विवश दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या स्वच्छ हवा में सांस लेना भी अब नागरिकों के लिए एक दुर्लभ सुविधा बनकर रह जाएगा? वायु प्रदूषण किसी एक कारण या किसी एक राज्य की देन नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, सड़कों पर जमा मिट्टी, कचरा और जैविक पदार्थ जलाना, ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन तथा कृषि अवशेषों का दहन इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। सर्दियों में तापमान गिरने, हवा की गति कम होने और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के निकट जमा हो सकते हैं। इससे प्रदूषण का प्रभाव अधिक गंभीर हो जाता है। इस प्रकार मौसम समस्या को बढ़ाता अवश्य है, लेकिन प्रदूषण पैदा करने वाले मूल कारण मुख्यतः मानवीय गतिविधियों और उनके अपर्याप्त नियमन से जुड़े हैं।
दिल्ली-एनसीआर की स्थिति इस संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। दिल्ली के साथ गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के अनेक शहर एक-दूसरे से जुड़े वायु क्षेत्र का हिस्सा हैं। इसलिए केवल दिल्ली की सीमाओं के भीतर उपाय करने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। हवा किसी प्रशासनिक सीमा को नहीं मानती, वह प्रदूषण को भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाती है। अतः समाधान भी क्षेत्रीय सहयोग, साझा जवाबदेही और समन्वित कार्ययोजना पर आधारित होना चाहिए। वायु प्रदूषण का सबसे भयावह पक्ष उसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। विशेष रूप से पीएम 2.5 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में रक्तप्रवाह तक प्रवेश कर सकते हैं। इनके लंबे समय तक संपर्क में रहने से हृदय एवं फेफड़ों संबंधी बीमारियों, स्ट्रोक और समयपूर्व मृत्यु का जोखिम बढ़ता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है।
यह संकट केवल सांस के मरीजों तक सीमित नहीं है। स्वस्थ दिखाई देने वाले लोगों की कार्यक्षमता, एकाग्रता और जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। स्कूल जाने वाले बच्चों को खुले मैदान में खेलने से रोकना पड़े, बुजुर्ग सुबह की सैर छोड़ने को विवश हों और श्रमिकों को जहरीली हवा में काम करना पड़े, तो यह केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। एयर प्यूरीफायर या मास्क कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत बचाव में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे स्वच्छ हवा की सार्वजनिक व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकते। प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) लागू करना आवश्यक है। इसके अंतर्गत प्रदूषण की गंभीरता के अनुसार निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध, वाहनों और उद्योगों पर नियंत्रण तथा अन्य आपातकालीन कदम उठाए जाते हैं। लेकिन इन उपायों की सफलता केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी से सुनिश्चित होती है। यदि प्रतिबंधों का उल्लंघन होता रहे, निर्माण स्थलों पर धूल उड़ती रहे और कचरा खुले में जलता रहे, तो सरकारी घोषणाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकतीं।
सरकार को प्रदूषण के चरम पर पहुंचने की प्रतीक्षा करने के बजाय सितंबर-अक्टूबर से ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण, सड़कों की नियमित सफाई, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और वाहनों के उत्सर्जन की जांच पहले से सुनिश्चित की जानी चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देना, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करना और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। कृषि क्षेत्र में पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों पर जुर्माना लगाने भर से नहीं होगा। उन्हें फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए सस्ती मशीनें, तकनीकी सहायता, आर्थिक प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर उपयोग की सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। किसानों को समस्या का भागीदार नहीं, समाधान का सहयोगी बनाना होगा।
प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। नागरिकों को निजी वाहनों का अनावश्यक उपयोग कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, कचरा और पत्तियां न जलाने तथा ऊर्जा की बचत करने जैसे कदम उठाने होंगे। पर्यावरण संबंधी नियमों के उल्लंघन की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना और स्थानीय स्तर पर स्वच्छता एवं हरित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों में भाग लेना भी आवश्यक है। मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को जनजागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि स्वच्छ हवा का महत्व केवल प्रदूषण के चरम पर ही याद न आए। साथ ही, वायु गुणवत्ता के आंकड़े पारदर्शी ढंग से सार्वजनिक किए जाएं और नागरिकों को प्रदूषण के स्तर के अनुरूप स्वास्थ्य संबंधी सलाह दी जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें, उद्योग, किसान और नागरिक अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हटें। चीन के बीजिंग जैसे शहरों में प्रदूषण घटाने के अनुभव यह बताते हैं कि निरंतर नीतिगत प्रयास, स्वच्छ परिवहन, औद्योगिक नियंत्रण और प्रभावी निगरानी से उल्लेखनीय सुधार संभव है। भारत को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे उपायों को दृढ़ता से लागू करना होगा। हर साल सर्दियों में प्रदूषण से जूझना और फिर मौसम बदलने पर समस्या को भूल जाना किसी भी संवेदनशील समाज की नियति नहीं हो सकती। स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए प्रदूषण का मुकाबला संकट गहराने के बाद नहीं, उससे पहले करना होगा। सरकार की सक्रियता, प्रशासन की जवाबदेही और जनता की जागरूकता ही वह त्रिकोण है, जिसके आधार पर हम दमघोंटू हवा से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
Leave a Comment