Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल का सूर्य जब भारतीय क्षितिज पर उदय होता है, तो वह केवल एक महापुरुष की जन्मतिथि का संदेश नहीं लाता, बल्कि उस महान संकल्प का स्मरण कराता है जिसने आधुनिक भारत की नियति लिखी थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर - एक ऐसा नाम, जो आज भारतीय जनमानस की चेतना में गहराई तक रचा-बसा है। देश के हर कस्बे और चौराहे पर उनकी प्रतिमाएं जीवंत हैं, नीले झंडे लहरा रहे हैं और जयकारों के स्वर आसमान छू रहे हैं। लेकिन, इस भव्य उत्सव और कोलाहल के बीच एक अत्यंत गंभीर और चुभता हुआ प्रश्न मौन खड़ा है क्या हमने वाकई उस इंसान को समझा, जिसने अपना पूरा जीवन न्याय, समता और मानवता की वेदी पर होम कर दिया? या फिर हमने अपनी सुविधा और संकुचित सोच के अनुसार उनकी विरासत के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं?
डॉ. अंबेडकर की शख्सियत का असली करिश्मा उनकी अद्भुत विद्वत्ता, फौलादी इरादों और सबसे बढ़कर उनके अडिग नैतिक साहस में छिपा था। वे केवल एक संविधान निर्माता या कानूनविद नहीं थे; वे एक ऐसे युगद्रष्टा थे जिनके पास भविष्य के भारत का पूर्ण खाका तैयार था। कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से शिक्षित उस व्यक्ति के पास दुनिया के किसी भी कोने में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने के विकल्प खुले थे, लेकिन उन्होंने उस कांटों भरे मार्ग को चुना जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की मुक्ति की ओर जाता था। उनके व्यक्तिगत जीवन में सामाजिक अपमान के अनगिनत गहरे घाव थे, लेकिन जब उन्हें देश का भाग्य लिखने की कलम मिली, तो उन्होंने बदला नहीं, बल्कि बदलाव की इबारत लिखी। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था की नींव रखी जहाँ किसी के साथ भी अन्याय न होकृचाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग का क्यों न हो। किन्तु, कड़वा सच तो यह है कि बाबा साहब की विराट विरासत के साथ सबसे बड़ा अन्याय यह हुआ कि उन्हें जातियों के खांचों में कैद करने की निरंतर कोशिश की गई। समाज का एक बड़ा हिस्सा उन्हें केवल एक विशिष्ट समुदाय का मसीहा मानकर अपनी भावनात्मक सीमाओं में सीमित कर बैठा। उन्होंने बाबा साहब को पूजा तो सही, लेकिन उनके उन तार्किक और प्रगतिशील विचारों को आचरण में नहीं उतारा जो अंधविश्वास और रूढ़ियों के कट्टर विरोधी थे। दूसरी ओर, मुख्यधारा के एक बड़े वर्ग ने दशकों तक उन्हें केवल दलितों का नेता मानकर उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखी। यह बौद्धिक दरिद्रता ही थी कि समाज यह नहीं समझ पाया कि डॉ. अंबेडकर द्वारा दिलाए गए अधिकार सार्वभौमिक थे। जब उन्होंने हिंदू कोड बिल के लिए अपनी कैबिनेट की कुर्सी दांव पर लगाई, तो उनका लक्ष्य समूचे भारत की नारी शक्ति को सशक्त बनाना था। अफसोस कि उन्हें एक पक्ष ने सिर्फ अपना माना और दूसरे ने पराया, जबकि वास्तविकता में वे पूरे राष्ट्र के थे।
आज की समकालीन राजनीति में डॉ. अंबेडकर एक अनिवार्य प्रतीक बन चुके हैं। सत्ता की बिसात पर हर राजनीतिक दल उन्हें अपना बताने की होड़ में है, लेकिन यह लगाव सिद्धांतों से ज्यादा वोटबैंक के गणित से प्रेरित है। उनके नाम पर भव्य रैलियां और विज्ञापन तो बहुत हैं, पर क्या हम उनके शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो के मंत्र को जी रहे हैं? यदि आज बाबा साहब जीवित होते, तो यह देखकर अत्यंत व्यथित होते कि जिस समाज को वे प्रबुद्ध बनाना चाहते थे, उसे आज केवल चुनावी आंकड़ों और ध्रुवीकरण के खेल में उलझा दिया गया है। वे व्यक्ति-पूजा के सख्त विरोधी थे, लेकिन आज उनके विचारों की आत्मा को किनारे रखकर केवल उनके नाम की ब्रांडिंग से राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। डॉ. अंबेडकर का मानववाद सबको साथ लेकर चलने वाला था। उन्होंने कभी भी किसी वर्ग के साथ अन्याय का समर्थन नहीं किया। रिजर्व बैंक की नींव से लेकर श्रमिक सुधारों और नदी परियोजनाओं तक, उनके समस्त कार्य एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के लिए थे। उनकी महानता इस बात में है कि उन्होंने कभी प्रतिशोध की भाषा नहीं सीखी; उनका मार्ग बुद्ध की करुणा और संवैधानिक नैतिकता का था। अब समय आ गया है कि हम डॉ. अंबेडकर को पत्थर की मूर्तियों और औपचारिकताओं के घेरे से बाहर निकालें। उन्हें केवल 14 अप्रैल की छुट्टियों तक सीमित रखना उनकी मेधा का अपमान है। वे एक वैश्विक विचार हैं, जो किसी एक दल या जाति की जागीर नहीं हो सकते। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यह नहीं होगी कि हम उनकी सबसे ऊँची प्रतिमा स्थापित करें, बल्कि यह होगी कि हम एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीयता से हो। जिस दिन हम उन्हें वोट के चश्मे के बजाय एक दृष्टिकोण के रूप में देखना शुरू करेंगे, उसी दिन उनके सपनों का भारत हकीकत बनेगा।
Leave a Comment